Bina Poonch Ki Lomdi | The Fox Without a Tail, Hindi Moral Story
About this video
A fox loses her tail in the thorns and invents a hunter to frighten the other foxes.
Bina Poonch Ki Lomdi is a Hindi moral story about a proud fox who loses her tail, hides the truth, and leads a whole forest astray.
Bina Poonch Ki Lomdi, the fox without a tail, is a Hindi animal fable retold for every age that still carries a sharp moral. It follows a clever fox who is proud of her thick, shining tail. One evening she leaves the safe path, pushes through a thorn thicket, and her tail gets caught in the branches. She struggles free in the dark, but the tail stays behind in the thorns.
The next morning the scratches hurt less than the fear of being laughed at. So the tailless fox hides in her cave for days, then hits on a plan: if no fox has a tail, nobody will call her different. She invites the whole forest to a feast, keeps the missing tail hidden behind a heap of dry leaves, and tells a frightening story about a hunter who took it and now threatens every fox in the jungle. The elder fox asks for proof. Fear wins, the questions stop, and she cuts off every guest's tail, one by one.
Up on a high branch, a monkey has watched the whole feast. His laugh stops the celebration. He leads the tailless foxes back to the old thicket, where a tuft of russet fur with a cream tip is still snagged in the twigs: no hunter, no trap, only thorns and a careless fox. The truth turns grief into anger, and the story ends in tragedy for the fox who lied.
The lesson lands hard, on purpose. A decision made in fear is usually a wrong one, and lying to hide a small shame can wound everyone around you. Before you act on a scary claim, ask what the evidence says. Watch the Hindi narration, share it with someone who needs the reminder, and tell us in the comments where you would have stopped the fox.
Chapters
0:00 A Proud Fox's Tail
0:27 Trapped in the Thorns
1:26 Waking Without a Tail
2:09 The Feast Plan
2:38 A Lie at the Feast
4:16 The Monkey's Laugh
4:51 Proof and the Price
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Hindi transcript
The narration as spoken, from the caption track uploaded with this video.
- 0:04.1 बहुत समय पहले, एक हरे-भरे जंगल में लोमड़ियों का बड़ा झुंड मिल-जुलकर शांति से रहता था।
- 0:12.142 उसी झुंड में एक चतुर लोमड़ी रहती थी, जिसे अपनी घनी, चमकीली पूँछ पर बहुत गर्व था।
- 0:19.183 वह चलते समय पूँछ ऊँची रखती, और साथियों की प्रशंसा सुनकर मन ही मन बहुत प्रसन्न होती थी।
- 0:27.225 एक संध्या भोजन खोजते हुए वह उस हिस्से में पहुँची, जहाँ काँटेदार झाड़ियाँ बहुत घनी थीं।
- 0:34.267 जल्दी घर लौटने की चाह में उसने सँकरी पगडंडी छोड़ दी और झाड़ियों के बीच से अकेली निकलने लगी।
- 0:41.308 अचानक उसकी पूँछ एक मजबूत काँटेदार डाल में उलझी, और लोमड़ी झाड़ी में बुरी तरह फँस गई।
- 0:49.35 उसने पहले धीरे से खुद को छुड़ाया, पर हर हलचल के साथ काँटे उसके बालों में और कसते गए।
- 0:56.392 घबराकर उसने शरीर को पूरी ताकत से आगे खींचा; टहनियाँ चुभीं और कई हल्की खरोंचें आ गईं।
- 1:04.433 रात गहराने लगी, इसलिए लोमड़ी ने अंतिम बार जोर लगाया और किसी तरह झाड़ी से बाहर निकल आई।
- 1:11.475 पर उसकी पूँछ काँटों में अटकी रह गई; घबराकर उसने पीछे मुड़कर देखने का साहस नहीं किया।
- 1:18.517 दर्द और थकान से काँपती लोमड़ी आखिर अपनी गुफा के भीतर पहुँची और वहीं बेसुध होकर सो गई।
- 1:26.558 अगली सुबह जब वह जागी, उसने शरीर की खरोंचें देखीं; पीछे देखा तो उसकी पूँछ गायब थी।
- 1:34.6 उसे चोट से अधिक यह चिंता सताने लगी कि साथी उसकी बदली हुई शक्ल देखकर आखिर क्या कहेंगे।
- 1:41.642 अब मैं सबके सामने कैसे जाऊँगी? मेरी पूँछ देखकर हँसने वाले आज मेरा ही मजाक बनाएँगे।
- 1:48.683 लज्जा और डर ने उसे गुफा में रोक लिया; वह कई दिनों तक किसी से मिलने बाहर नहीं निकली।
- 1:54.725 दूसरी लोमड़ियाँ पास से पुकारतीं, मगर वह हर बार बीमारी या भारी थकान का बहाना बना देती।
- 2:01.767 चिंता में डूबी लोमड़ी सच स्वीकारने के बदले दिन-रात अपनी कमी छिपाने का कोई चालाक उपाय खोजती रही।
- 2:09.808 एक दिन उसके मन में विचार आया: यदि किसी की पूँछ न रहे, तो कोई उसे अलग नहीं समझेगा।
- 2:16.85 मैं सबको समझा दूँगी कि बिना पूँछ रहना ही सुरक्षित रहने और बुद्धिमानी की निशानी है।
- 2:22.892 उसने पूरे जंगल के साथियों को संदेश भिजवाया कि शाम को उसकी गुफा के बाहर खास दावत होगी।
- 2:29.933 दिनभर उसने फल, जामुन, कंद और मीठे बेर सजाए, ताकि हर मेहमान उसकी बात ध्यान से सुने।
- 2:37.975 सूरज ढलते ही सब छोटी-बड़ी लोमड़ियाँ खुशी से वहाँ पहुँचीं और एक गोल घेरे में बैठ गईं।
- 2:44.017 मेजबान ने मुस्कराकर सबका स्वागत किया, पर अपनी कटी पूँछ सूखे पत्तों के ढेर के पीछे छिपाए रही।
- 2:52.058 दावत के भोजन और मेजबान की मीठी बातों से सभी प्रसन्न हुए, फिर एक बुजुर्ग लोमड़ी उठी।
- 3:00.1 अब मेजबान धीरे-धीरे सबके सामने आई; उसकी पूँछ न देखकर पूरे घेरे में गहरी हैरानी फैल गई।
- 3:08.142 बहन, इतने दिनों बाद तुमने यह दावत किस खुशी में रखी है, और हमसे यूँ छिप क्यों रही हो?
- 3:14.183 कुछ दिन पहले एक शिकारी ने मुझे पकड़ लिया था; जान बचाने के बदले उसने मेरी पूँछ माँगी।
- 3:21.225 उसने चेताया कि जंगल की लोमड़ी खतरे में पड़ सकती है, इसलिए मेरी बात हल्के में मत लेना।
- 3:28.267 उसने असली झाड़ी, काँटों और अपनी असावधानी का सच छिपाकर सबको डरावनी कहानी बड़ी सफाई से सुना दी।
- 3:37.308 शिकारी का नाम सुनते ही कई लोमड़ियाँ घबरा गईं, और मन में अनहोनी की तस्वीरें बनने लगीं।
- 3:43.35 यदि तुम सब अभी अपनी पूँछ कटवा लो, तो शिकारी के पास तुमसे छीनने के लिए कुछ नहीं बचेगा।
- 3:49.392 क्या यह सच में जरूरी है? क्या किसी ने उस खतरनाक शिकारी को जंगल में आते हुए देखा है?
- 3:55.433 मेजबान ने सवाल टालकर तुरंत फैसला करने को कहा; डर ने बाकी लोमड़ियों की समझ ढक ली।
- 4:02.475 उसने एक-एक करके सबकी पूँछ काट दी; किसी ने प्रमाण खोजने के लिए थोड़ा भी समय नहीं लिया।
- 4:09.517 अब घेरे में बैठी हर लोमड़ी अलग दिख रही थी, फिर भी सभी खुद को पहले से सुरक्षित मान रही थीं।
- 4:16.558 उसी पेड़ की ऊँची डाल पर एक बंदर शुरू से चुपचाप नीचे की पूरी दावत और बातचीत देख रहा था।
- 4:24.6 उसने भय से लिया निर्णय देखा तो सिर पकड़ा, लोमड़ियों की जल्दबाजी पर जोर से हँस पड़ा।
- 4:31.642 उसकी हँसी सुनते ही सभी ने ऊपर देखा; अब उनके उत्सव की जगह उलझन और नाराज़गी फैल गई।
- 4:38.683 मैं तुम्हारी दशा पर नहीं, बिना जाँच इतनी बड़ी बात मान लेने की भूल पर हँस रहा हूँ।
- 4:45.725 बंदर भाई, यदि तुम सच्चाई जानते हो तो हमें साफ-साफ बताओ; हमने बड़ा निर्णय ले लिया है।
- 4:51.767 मेरे साथ उस पुरानी काँटेदार झाड़ी तक चलो; वहीं तुम्हें इस कहानी का छूटा हुआ हिस्सा मिल जाएगा।
- 4:59.808 बंदर आगे छलाँग लगाता चला, और बिना पूँछ वाली सब लोमड़ियाँ चुपचाप उसके पीछे बढ़ती गईं।
- 5:06.85 कुछ दूर वे उसी घनी झाड़ी के सामने पहुँचे, जहाँ सूखी डालों में बालों का गुच्छा फँसा था।
- 5:13.892 देखो, यह उसी लोमड़ी की पूँछ है; यहाँ न शिकारी के पदचिह्न हैं, न किसी जाल का निशान।
- 5:21.933 बंदर ने टूटी टहनियाँ और खरोंचों के निशान दिखाकर बताया कि दुर्घटना असल में कैसे हुई थी।
- 5:28.975 मैं शर्म से डर गई थी, इसलिए झूठ बोला; अपनी कमी छिपाने के लिए मैंने तुम सबको नुकसान पहुँचाया।
- 5:37.017 सच सामने आते ही दुख क्रोध में बदल गया, और लोमड़ियों ने छल करने वाली साथी को घेर लिया।
- 5:44.058 इसने हमें छलकर बहुत बड़ा नुकसान कराया है; अब इसे अपने कर्म का कठोर परिणाम भोगना होगा।
- 5:50.1 क्रोधित लोमड़ियों ने उस पर हमला कर दिया, और उस दुखद संघर्ष के दौरान उसकी जान चली गई।
- 5:57.142 दुखद अंत का संदेश था: डर में फैसला गलत पड़ता है; हर बात प्रमाण और समझ से परखनी चाहिए।
- 6:05.183 ऐसी ही बुद्धि और साहस वाली कहानियों के लिए जुड़े रहिए, और यह सीख अपने मित्रों तक पहुँचाइए।