Kachhua Aur Khargosh | Tortoise and Hare Moral Story
About this video
The hare stops to rest. The tortoise keeps walking toward the red flag.
Kachhua Aur Khargosh turns a forest race into a sharp lesson: steady effort beats speed when pride decides to rest.
Kachhua Aur Khargosh begins in Premvan, where a young hare is famous for moving like lightning across the meadow. Praise turns into pride, and soon he challenges every animal he meets. At the river, he laughs at an old tortoise's careful steps, but the tortoise calmly accepts a race to the red flag and promises only one thing: he will not stop.
At sunrise, the elder bear marks the course while deer, monkeys, peacocks, birds, and a little squirrel gather to watch. The hare explodes from the starting line and leaves the tortoise far behind, then, convinced the result is certain, stretches out beneath a shady banyan for a short rest and falls deeply asleep. The tortoise keeps placing one foot in front of the other, passes the sleeping hare without waking him, and reaches the crimson flag as evening settles over the forest.
When the hare finally wakes, speed cannot recover the time his confidence wasted; he arrives to find the tortoise surrounded by cheers, admits that pride cost him the race, and asks for forgiveness. The tortoise takes his paw, turning a contest into a lesson about humility, patience, and friendship. This animated animal fable makes the familiar slow and steady message more precise: talent matters, but steady effort wins when talent stops trying, a useful lesson for work, study, and everyday goals.
Chapters
0:00 The Hook
0:41 The Setup
1:18 The Story Unfolds
6:54 The Turning Point
7:20 The Resolution
8:08 What's Next
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Story guide
The Tortoise and the Hare: What Pride, Patience and Persistence Teach Children
Hindi transcript
The narration as spoken, from the caption track uploaded with this video.
- 0:04.088 घने हरे प्रेमवन के बीचों-बीच एक बड़ा खुला मैदान था, और उसी मैदान के किनारे ऊँची घास की झुरमुट के नीचे एक खरगोश अपने छोटे-से बिल में रहता था।
- 0:17.13 वह खरगोश पूरे जंगल में सबसे तेज़ दौड़ने वाला था। पर एक दिन उसी जंगल के सबसे धीमे चलने वाले कछुए ने उसे रेस में हरा दिया। यह सब हुआ कैसे, आइए सुनते हैं।
- 0:30.171 रोज़ सुबह वह मैदान के एक सिरे से दूसरे सिरे तक दौड़ लगाता था, और रास्ते में मिलने वाला हर जानवर ठहरकर उसकी उस बिजली जैसी चाल को देखता रह जाता।
- 0:41.213 पर धीरे-धीरे अपनी इसी तेज़ चाल पर खरगोश को बहुत नाज़ हो गया। अब वह दौड़ता कम था और पूरे जंगल में घूम-घूमकर अपनी दौड़ की बड़ाई कहीं ज़्यादा करता था।
- 0:54.255 इस पूरे प्रेमवन में मुझसे तेज़ कोई नहीं दौड़ सकता। जिसे अपनी टाँगों पर ज़रा भी भरोसा हो, वह आज ही आगे आए और मेरे साथ मैदान में एक रेस लगाकर देख ले।
- 1:05.296 जो भी जानवर उसे रास्ते में मिलता, खरगोश उसे रेस के लिए ललकार देता था। कोई हँसकर टाल देता, तो कोई चुपचाप आगे बढ़ जाता, पर उसका यह खेल रोज़ चलता।
- 1:18.338 एक दिन दोपहर में सूरज सिर के ठीक ऊपर आ गया और गरमी इतनी बढ़ गई कि जंगल के सारे पंछी भी अपने घोंसले छोड़कर पत्तों की ठंडी छाँव में जाकर चुप हो बैठे।
- 1:31.38 खरगोश का गला भी सूखने लगा, इसलिए वह वन के किनारे बहने वाली उसी छोटी नदी पर जा पहुँचा, जहाँ किनारे के चिकने गोल पत्थरों पर लहरें चमक बना रही थीं।
- 1:44.421 तभी उसकी नज़र पानी के किनारे धीरे-धीरे चलते एक कछुए पर पड़ी। कछुआ अपनी मोटी भूरी ढाल जैसी पीठ लिए, बहुत आराम से, एक-एक क़दम रखकर आगे बढ़ रहा था।
- 1:57.463 खरगोश वहीं खड़ा होकर उसकी उस धीमी चाल को देखता रहा। कछुए को एक छोटा-सा पत्थर पार करने में इतना समय लगा कि खरगोश से रहा नहीं गया और वह हँस पड़ा।
- 2:11.505 अरे कछुए भाई, तुम चल रहे हो या वहीं खड़े हो? इतनी धीमी चाल से तो तुम्हें उस सामने वाले मैदान तक पहुँचने में ही पूरी शाम लग जाएगी। ज़रा जल्दी चलो।
- 2:22.546 कछुए ने अपनी गरदन थोड़ी ऊपर उठाई और बड़ी शांत आँखों से खरगोश की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर न कोई ग़ुस्सा था और न ही कोई जल्दबाज़ी दिखाई दे रही थी।
- 2:34.588 अगर सच में हिम्मत है तो मेरे साथ एक रेस लगाकर दिखाओ। यहाँ से मैदान के उस दूर वाले छोर तक जो पहले पहुँच जाए, वही जीता। बोलो भाई, है तुममें दम?
- 2:45.63 ठीक है खरगोश भाई, मैं तुम्हारे साथ ज़रूर रेस लगाऊँगा। मैं जानता हूँ कि मेरी चाल धीमी है, पर मैं बीच रास्ते में कहीं रुकूँगा नहीं, यह मेरा वादा है।
- 2:55.671 यह बात देखते ही देखते पूरे प्रेमवन में फैल गई। शाम होते-होते जंगल के हर कोने में बस एक ही चर्चा थी कि कल सुबह कछुए और खरगोश की रेस होने वाली है।
- 3:07.713 अगली सुबह सूरज निकलते ही मैदान के किनारे जंगल के सारे जानवर इकट्ठा हो गए। हिरन, बंदर, मोर और नन्हीं चिड़ियाँ सब अपनी पसंद की जगह जमकर बैठ गए।
- 3:20.755 आज तो सबको बहुत मज़ा आएगा! एक तरफ़ हवा से बातें करने वाला हमारा तेज़ दौड़ने वाला खरगोश, और दूसरी तरफ़ धीरे-धीरे चलने वाला सीधा-सादा कछुआ भाई।
- 3:32.796 जंगल के सबसे बुज़ुर्ग भालू को इस रेस का फ़ैसला करने के लिए चुना गया। वह अपनी लाठी टेकता हुआ धीरे-धीरे मैदान के बीच आया और दोनों को पास बुलाया।
- 3:44.838 रास्ता बिल्कुल सीधा है। यहाँ से चलकर जंगल के उस पार गड़े लाल झंडे तक जाना है। जो वहाँ पहले पहुँचकर झंडे को छू लेगा, वही आज का विजेता कहलाएगा।
- 3:57.88 दोनों अपनी-अपनी जगह पर लकीर के पीछे खड़े हो गए। भालू ने अपना भारी पंजा हवा में उठाया, सब जानवर चुप हो गए, और फिर उसने रेस शुरू होने का इशारा किया।
- 4:09.921 इशारा मिलते ही खरगोश हवा की तरह आगे निकल गया। उसके पंजों के नीचे से मिट्टी उड़ी और देखते ही देखते वह घास के उस दूर वाले मोड़ के पार पहुँच गया।
- 4:21.963 कछुआ अपनी उसी धीमी चाल से आगे चला। एक क़दम, फिर दूसरा क़दम, और फिर तीसरा। उसने न तो जल्दी करने की कोशिश की और न ही रुककर कभी पीछे मुड़कर देखा।
- 4:36.005 कुछ दूर तक भागने के बाद खरगोश ने ठहरकर पीछे मुड़कर देखा। कछुआ अभी बहुत पीछे था और अपनी उसी धीमी चाल से, एक-एक क़दम रखता हुआ, चुपचाप आ रहा था।
- 4:50.046 अरे, यह तो अभी वहीं का वहीं है! ऐसे चलता रहा तो यह शाम तक भी उस झंडे तक नहीं पहुँच पाएगा। आज सब जानवर देख लेंगे कि इस जंगल में सबसे तेज़ कौन है।
- 5:02.088 यह सोचकर खरगोश पहले से भी तेज़ भागने लगा। ऊँचे पेड़, झाड़ियाँ और पत्थर सब उसके दोनों तरफ़ से पीछे छूटते चले गए, जैसे पूरा जंगल ही पीछे भाग रहा हो।
- 5:15.13 लगभग आधा रास्ता पार करके खरगोश एक बार फिर ठहरा और पीछे मुड़कर देखा। इस बार पूरे रास्ते में दूर-दूर तक कहीं भी कछुए का नामो-निशान नहीं दिखा।
- 5:28.171 ठीक रास्ते के किनारे एक बहुत बड़ा छायादार पेड़ खड़ा था। उसकी घनी डालियों के नीचे ठंडी हवा चल रही थी और ज़मीन पर मख़मल जैसी नरम हरी घास बिछी थी।
- 5:40.213 अभी तो कछुआ बहुत ही पीछे है। चलो, इस पेड़ की ठंडी छाँव में थोड़ी देर आराम कर लेता हूँ। वह जब तक यहाँ आएगा, मैं उससे कहीं पहले झंडे तक पहुँच जाऊँगा।
- 5:51.255 खरगोश उस पेड़ की छाँव में नरम घास पर बैठ गया। ठंडी हवा उसके लंबे कानों से टकराई, ऊपर पत्तों की हल्की सरसराहट हुई, और उसकी आँखें भारी होने लगीं।
- 6:04.296 थोड़ी ही देर में खरगोश की आँख लग गई और वह उसी पेड़ के नीचे गहरी नींद में सो गया। उसे यह भी पता नहीं चला कि दोपहर कब ढलकर धीरे-धीरे शाम में बदल गई।
- 6:18.338 उधर कछुआ अपनी उसी शांत चाल से चलता रहा। न वह कहीं रुका, न उसने कहीं आराम किया, और न ही उसने एक बार यह सोचा कि खरगोश उससे कितना आगे निकल चुका है।
- 6:31.38 चलते-चलते कछुआ भी उसी छायादार पेड़ के पास आ पहुँचा। उसने वहाँ देखा कि खरगोश नरम घास पर अपने पैर फैलाए, बड़े आराम से, गहरी नींद में सोया हुआ है।
- 6:44.421 मैं चाहूँ तो इसे अभी जगा सकता हूँ, पर आज इसे अपनी ग़लती ख़ुद ही समझनी चाहिए। मेरा काम तो बस चलते रहना है, और मैं आख़िर तक यही काम करता रहूँगा।
- 6:54.463 कछुआ उसी शांत चाल से आगे बढ़ता रहा। सूरज धीरे-धीरे ढलने लगा, पेड़ों की परछाइयाँ लंबी होती गईं, और आख़िरकार कछुए का अगला पंजा लाल झंडे से जा लगा।
- 7:07.505 इसके कुछ देर बाद खरगोश की आँख खुली। उसने चौंककर चारों तरफ़ देखा, फिर घबराकर उछलकर खड़ा हुआ और अपनी पूरी ताक़त लगाकर सीधा झंडे की तरफ़ भागने लगा।
- 7:19.546 वह हाँफता हुआ मैदान के उस दूर वाले छोर पर पहुँचा, पर कछुआ तो उससे पहले ही झंडे के पास खड़ा था और सारे जानवर तालियाँ बजाकर उसका नाम पुकार रहे थे।
- 7:31.588 आज की इस रेस का विजेता कछुआ है। यह तेज़ नहीं चला, पर यह एक बार भी बीच में नहीं रुका। और जो रुकता नहीं, वह देर से ही सही, अपनी मंज़िल तक पहुँच जाता है।
- 7:44.63 मुझे माफ़ कर दो कछुआ भाई। आज मुझे अपनी ग़लती समझ आ गई। मुझे अपनी तेज़ चाल पर बहुत घमंड हो गया था, और उसी घमंड ने मुझे उस पेड़ के नीचे सुला दिया।
- 7:55.671 खरगोश को अपने अभिमान पर बहुत पछतावा हुआ। कछुए ने आगे बढ़कर मुस्कुराते हुए उसका पंजा थाम लिया, और फिर दोनों साथ-साथ अपने-अपने घर की तरफ़ लौट चले।
- 8:07.713 इस प्यारी कहानी की सीख यही है कि हमें अपनी ताक़त और अपनी कामयाबी पर कभी घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि घमंड ही हमें रास्ते के बीच में रोक देता है।
- 8:19.755 और दूसरी सीख यह है कि लगातार चलते रहना ही सबसे बड़ी ताक़त है। चाल चाहे कितनी भी धीमी हो, पर जो रुकता नहीं, वह अपने लक्ष्य तक ज़रूर पहुँच जाता है।
- 8:32.796 अगर यह कहानी आपको अच्छी लगी हो तो इसे अपने दोस्तों को ज़रूर भेजिए, नीचे कमेंट में बताइए कि आपको कौन-सी सीख सबसे अच्छी लगी, और चैनल को सब्सक्राइब कीजिए।